अल्मोड़ा का गौरवशाली इतिहास, तीन मंजिला पारंपरिक मकान आज भी बना है आकर्षण का केंद्र, पढ़े कैसे बना है ये

अजब गजब इतिहास

उत्तराखंड के जिला अल्मोड़ा का अतीत में एक गौरवशाली इतिहास रहा है। 18वीं सदी में जिला बना और ब्रिटिशकाल में कमिश्नरी रहा और अपने भूभाग से कुमाऊं के तकरीबन सभी जिले भी दिए। इस गौरवशाली गाथा में यहां के पारम्परिक मकान का भी अपना महत्व है। जो तमाम प्रकृतिक आपदाओं के बावजूद भी 1000 हजार साल से सीना ताने खड़े है। इन्ही मकानों में से एक रानीखेत से कुछ दूर पागसा गाँव में स्थित यह तीन मंजिला पारम्परिक मकान जिसकी सुन्दरता देखते ही बनती है। पहाड़ में परंपरागत बने मकानों में स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थर, मिट्टी, लकड़ी का प्रयोग होता रहा। पत्थर से बना मकान जिस पर मिट्टी के बने गारे से पत्थर की चिनाई की जाती थी।

आपको बता दें कि इन मकानों में स्थानीय रूप से उपलब्ध मजबूत लकड़ी से दरवाजा व छाजा तथा खिड़की बनती थी, जिसमें सुन्दर नक्काशी की जाती थी। घर की छत में मोटी गोल बल्ली या ‘बांसे’ डलते, तो धुरी में मोटा चौकोर पाल पड़ता जिसे ‘भराणा’ कहा जाता। यह चीड़ की लकड़ी का अच्छा माना जाता था। धुरी में भराणा डाल छत की दोनों ढलानों में बांसे रख इनके ऊपर बल्लियां रखी जातीं। बल्लियों के ऊपर ‘दादर’ या फाड़ी हुई लकड़ियां बिछाई जातीं या तख्ते चिरवा के लगा दिये जाते। इनके ऊपर चिकनी मिट्टी के गारे से पंक्तिवार पाथर बिछे होते। दो पाथर के जोड़ के ऊपर गारे से एक कम चौड़ा पाथर रखा जाता जिसे ‘तोप’ कहते हैं।

दरअसल पहाड़ों में ढलान पर बने घरों के आंगन को तीन ओर दीवारों से घेरा जाता है, ये दीवारें सुरक्षा की दृष्टि से तथा बैठने के उपयोग से बनाई जाती हैं। इसी को खोई अर्थात खोली बोला जाता है। घर के कमरों में चिकनी मिट्टी और भूसी मिला कर फर्श बिछाया जाता है। जिसे पाल भी कहा जाता है तथा इसे गोबर से लीपा जाता है। दीवारों में एक फ़ीट की ऊंचाई तक गेरू का लेपन कर बिस्वार से तीन या पांच की धारा में ‘वसुधारा’डाली जाती है। गेरू और बिस्वार से ही ऐपण पड़ते है। अलग अलग धार्मिक आयोजनों व कर्मकांडों में इनका स्वरुप भिन्न होता है। हर घर के भीतरी कक्ष में पुर्व या उत्तर दिशा के कोने में पूजा के लिए मिट्टी की वेदी बनती जो ‘द्याप्ता ठ्या’ कहलाती है। बाखली में मकान एक बराबर ऊंचाई के तथा दो मंजिला या तीन मंजिला होते थे।

पहली मंजिल में छाजे या छज्जे के आगे पत्थरों की सबेली करीब एक फुट आगे को निकली रहती जो झाप कहलाती। ऊपरी दूसरी मंजिल में दोनों तरफ ढालदार छत होती जिसे पटाल या स्लेट से छाया जाता।नीचे का भाग गोठ कहा जाता जिसमें पालतू पशु रहते तो ऊपरी मंजिल में परिवार। दो मंजिले के आगे वाले हिस्से को चाख कहते हैं जो बैठक का कमरा होता है। इसमें ‘छाज’ या छज्जा होता है। सभी घरों के आगे पटाल बिछा पटांगण(आंगन) होता है जिसके आगे करीब एक हाथ चौड़ी दीवार होती है जो बैठने के भी काम आती है।

 

 

 

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