आखिर क्यों उत्तराखंड को कहते हैं देवभूमि? क्या है यहाँ खास

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उत्तराखंड जैसे पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था पर 2017 में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखकर इसे उत्तराखंड नाम दिया गया खूबसूरत पहाड़ी हो बहती नदियों सुहावने मौसम और यहां के जंगलों की हरियाली को देखने दूर-दूर से लोग आते हैं


पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और संस्कृत में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। इस लिए इसे देवभूमि के नाम से जाना जाता है।
पौराणिक ग्रन्थों में कुर्मांचल क्षेत्र मानसखण्ड के नाम से प्रसिद्व था। पौराणिक ग्रन्थों में उत्तरी हिमालय में सिद्ध गन्धर्व, यक्ष, किन्नर जातियों की सृष्टि और इस सृष्टि का राजा कुबेर बताया गया हैं। कुबेर की राजधानी अलकापुरी (बद्रीनाथ से ऊपर) बतायी जाती है। पुराणों के अनुसार राजा कुबेर के राज्य में आश्रम में ऋषि-मुनि तप व साधना करते थे। अंग्रेज़ इतिहासकारों के अनुसार हूण, शक, नाग, खस आदि जातियाँ भी हिमालय क्षेत्र में निवास करती थी। पौराणिक ग्रन्थों में केदार खण्ड व मानस खण्ड के नाम से इस क्षेत्र का व्यापक उल्लेख है। इस क्षेत्र को देवभूमि व तपोभूमि माना गया है। कश्मीर की तरह ही उत्तराखंड को भी धरती का स्वर्ग कहा जाता है।

क्यों कहा जाता है देवभूमि


माना जाता है पूरे भारत के देवी देवताओं का और महान ऋषियों का जन्म यहीं हुआ इसीलिए इसे देवभूमि कहा जाता है।इसके पीछे कई कहानियां भी हैं1. पूरे भारत की सबसे विशाल और पवित्रत नदियाँ देवभूमि उत्तराखंड से निकलती हैं। गंगा, यमुना और सरस्वती नदी का उद्गम स्थल है उत्तराखंड।2. भगवान शिव का ससुराल है उत्तराखंड का दक्ष प्रजापति नगर।3. पाण्डवों से लेकर कई राजाओं ने तप करने के लिए इस महान भूमि को चुना है। ध्यान लगाने के लिए महात्मा इस जगह को उपयुक्त मानते हैं और आते हैं। कई साधुओं ने यहाँ स्तुति कर सीधा ईश्वर की प्राप्ति की है। पाण्डव अपने अज्ञातवास के समय उत्तराखंड में ही आकर रुके थे।

महान देवी-देवताओं की विरासत

केदारनाथ


केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

बद्रीनाथ

बद्रीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं एवं जैनो का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। यह धाम जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को भी समर्पित है। वैसे इसका नाम शास्त्रों – पुराणों में बदरीनाथ है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। हल्द्वानी रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रुद्रप्रयाग में मिल जाते है। रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रुद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है।

हरिद्वार

उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर तथा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है। यह नगर निगम बोर्ड से नियंत्रित है। यह बहुत प्राचीन नगरी है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। ३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को ‘गंगाद्वार’ के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ “हरि (ईश्वर) का द्वार” होता है। पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। ध्यातव्य है कि कुम्भ या महाकुम्भ से सम्बद्ध कथा का उल्लेख किसी पुराण में नहीं है। प्रक्षिप्त रूप में ही इसका उल्लेख होता रहा है। अतः कथा का रूप भी भिन्न-भिन्न रहा है। मान्यता है कि चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। वे स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक और प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर १२वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है।एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है। ‘हर की पौड़ी’ हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है।

मदमहेश्वर

पंचकेदारों में मदमहेश्वर दूसरा केदार है। मान्यता है कि आदि केदारेश्वर भगवान शिव की नाभि का पूजन यहां होता है। शिव के मध्यभाग के दर्शन के कारण इसे मदमहेश्वर नाम मिला। यहां मौजूद शिवलिंग की आकृति नाभि के समान ही है। केदारघाटी के कालीमठ से होकर यहां जाने के कारण विषम भौगोलिक परिस्थितियां यहां तीर्थयात्रियों की संख्या सीमित कर देती है। यहां जाने के लिए रुद्रप्रयाग से केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग से ऊखीमठ पहुंचना होता है। ऊखीमठ से उनियाणा गांव तक मोटर मार्ग से पहुंचा जाता है। इसके बाद रांसी गौंडार गांव से 10 किलोमीटर की चढ़ाई पार कर भगवान मदमहेश्वर के मंदिर तक पहुंचना होता है। यहां के लिए दूसरा मार्ग गुप्तकाशी से भी है, जहां से कालीमठ तक वाहन से जाने के बाद आगे पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है, यह ट्रैकिंग रूट काफी रमणीक है।

रुद्रनाथ

रुद्रनाथ देश का पहला तीर्थ है जहां भगवान शिव के मुखाकृति के दर्शन होते हैं। इसे पितरों का तारण करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ माना जाता है। इस साल 19 मई को इस तीर्थ के कपाट खुल चुके हैं। कहा जाता है कि रुद्रनाथ तीर्थ में ही देवर्षि नारद ने भगवान शंकर को कनखल (हरिद्वार) में दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ कराने के दौरान देवी सती के दाह की सूचना दी थी। रुद्रनाथ में ही नारद को भगवान शिव ने नाद ब्रहम, पिण्डोत्पत्ति, रागोत्पत्ति, संगीतशास्त्र, गीत शास्त्र एवं श्रृंगार शास्त्र का ज्ञान दिया। भगवान रुद्रनाथ यहां गुफा में विराजते हैं। यह विशाल गुफा दो खंडों में है। भगवान रुद्रेश्वर का दर्शन, निर्वाण एवं श्रृंगार, दोनों रूपों में होता हे। कुछ बायीं ओर झुकी मूर्ति मुखमुद्रा यह प्रदर्शित करती है कि भगवान नीलकंठ प्रसन्न मुद्रा में विचारवान हैं। रुद्रनाथ तीर्थ देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना जाता है। केदारनाथ के रूप में इस तीर्थ को चतुर्थ केदार कहा जाता है। सती द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ में योगाग्नि द्वारा भस्म होने पर भगवान शंकर क्रोध में थे। देवर्षि नारद ने उन्हें यह सूचना दी। सूचना मिलते ही भगवान शंकर ने अपने जटाजूट से केश उखाड़कर पटक डाले। जिस स्थान पर यह केश गिरे उससे नन्दी, वीरभद्र आदिगण प्रकट हुए। उन्होंने दक्ष प्रजापति का यज्ञ भंग कर दिया। रुद्रनाथ पहुंचने के लिए पहला मार्ग गोपेश्वर के ग्राम ग्वाड़-देवलधार, किन्नखोली-किन महादेव होते हुए, दूसरा मार्ग मण्डल चट्टी-अत्रि अनुसूइया आश्रम होते हुए, तीसरा मार्ग गोपेश्वर सगर ज्यूरागली-पण्डार होते हुए, चौथा मार्ग ग्राम देवर मौनाख्य- नौलाख्य पर्वत पंडार खर्क होते हुए जाता है।

गंगोत्री और यमुनोत्री का पौराणिक महत्व

गंगोत्री


गंगोत्री उत्तराखण्ड में वह स्थान है जंहा राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजो की मुक्ति के लिए गंगा जी (प्राचीन नाम भागीरथी ) को पृथ्वी पे उतारा था।गंगोत्री नदी गंगोत्री ग्लेशियर से निकलती है जो गंगोत्री शहर से लगभग 18 किमी दूर है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित, गंगोत्री का मूल मंदिर 19वीं शताब्दी में बनाया गया था।

यमुनोत्री


यमुनोत्री उत्तराखण्ड में वो जगह है जंहा भारत की दूसरी सबसे पवित्र नदी यमुना नदी का उद्गम स्थल है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में स्थित यमुनोत्री धाम तीर्थ यात्रा में प्रथम पड़ाव है। ऐसा माना जाता है कि उसके पानी में स्नान करने से सारे पाप धुल जाते है और असामान्य और दर्दनाक मौत से बचा जा सकता है। माना जाता है कि यमुनोत्री का मंदिर 1839 में टिहरी के राजा नरेश सुदर्शन शाह द्वारा बनाया गया था। यमुना देवी (देवी) के अलावा, गंगा देवी की मूर्ति भी मंदिर में स्थित है। मंदिर के पास कई गर्म पानी के झरने हैं; उनके बीच सूर्य कुंड सबसे महत्वपूर्ण है। इस कुंड में चावल और आलू उबालें जाते है और इसे देवी के प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता हैं।

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