साइखोम मीराबाई चानू – कभी दूध खरीदने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे, आज टोक्यो ओलंपिक में भारत को दिलाया पहला पदक

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मीराबाई चानू बचपन में जब पहली बार कुंजारानी देवी को वेटलिफ्टिंग करते हुए देखा था। तो उन्हें यहां खेल काफी अच्छा लगा था और काफी आकर्षक भी लगा था वह हमेशा यही सोचती रहती थी कि वह इतना ज्यादा वजन कैसे उठा लेती हैं इसके बाद उन्होंने अपने माता-पिता से कहा कि उन्हें भी ऐसे ही करना है अपने जीवन में काफी मान मनोबल और करने के बाद उनके माता-पिता सहमत हो गए उन्होंने बताया कि उनके राज्य मणिपुर में कुंजारानी देवी की तुलना देश के जाने-माने खिलाड़ी सानिया मिर्जा से की जाती है। क्योंकि उनकी लोकप्रिय लोकप्रियता सानिया मिर्जा से कम नहीं है।

मणिपुर में उस दौर में हर मणिपुर लड़की उनकी तरह ही बनना चाहती थी और अपने जीवन में एक नाम कमाना चाहती थी लेकिन बचपन के दिनों में पूर्वी इंफाल स्थित छोटे से गांव में वेटलिफ्टिंग का कोई भी सेंटर मौजूद नहीं था और उन्हें ट्रेनिंग करने के लिए अपने गांव से 8 किलोमीटर दूर पैदल यात्रा करनी पड़ती थी।

जूनियर स्तर का सफर रहा आसान

जब वह केवल 13 साल की थी तो उन्होंने इंफाल में वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। सन 2011 में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय चैंपियनशिप और दक्षिण एशियाई जूनियर खेलों में भारत का नाम ऊंचा करते हुए स्वर्ण पदक दिलाया था। 2 साल बाद उन्हें जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में सर्वश्रेष्ठ भारोतो का खिताब भी दिया गया था। उनकी जूनियर स्तर की लगभग हर एक प्रतियोगिता में उन्हें जीत मिली और उनका सफर काफी आसान रहा।

लेकिन जैसे ही मीराबाई चानू ने सीनियर लेवल पर खेलना शुरू करो उनके लिए चुनौतियां बढ़ती गई। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी सन 2014 में गिलासको के राष्ट्रीय मंडल खेलों में उन्होंने रजत पदक जीतकर भारत का नाम रोशन करा और अपने अंदर आत्मविश्वास को और लंबी ऊंचाई दी।

काफी अभाव में बीता था उनका बचपन

जब वह जूनियर स्तर पर खेलना शुरू किया था तो उस वक्त उनके पास काफी बुनियादी सुविधाएं मौजूद नहीं थी उनके पोस्ट उन्हें हमेशा से ही डाइट चार्ट देते थे कि उन्हें किस तरीके से और कब क्या खाना है उसमें चिकन और दूध डाइट का अनिवार्य हिस्सा होता था पर मेरे घर में आर्थिक स्थिति अच्छी ना होने के कारण वह अपना डाइट चार्ट ढंग से पढ़ो नहीं कर पाती थी काफी समय तक में अपर्याप्त पोषण के बावजूद भी वेटलिफ्टिंग करती रही जिसका पूरा असर धीरे-धीरे उनके खेल पर पड़ने लगा लेकिन जब एक गिलास दूध भी नहीं सकती थी उनकी स्थिति इस प्रकार थी उस वक्त बुरा वक्त भी उनके जीवन से जल्दी खत्म हो जाएगा।

एक बार तो खेल छोड़ने तक की बात भी हो गई थी

मीराबाई चानू ने बताया कि रियो ओलंपिक से पहले का दौर उनके जीवन और उनकी खैरियत में सबसे महत्वपूर्ण रहा है उस दौरान एक वक्त ऐसा भी आया था जब उनकी घर की स्थिति बहुत ही ज्यादा खराब हो गई थी जिसकी वजह से उन्हें लगा था कि शायद वह ओलंपिक क्वालीफाई भी ना कर सकेंगे उनके घर वालों ने उनसे भारोत्तोलन छोड़ने तक को कह दिया था लेकिन उनकी खुशकिस्मती है कि उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर दिया और आगे बढ़ी भले ही मैं वहां पर अच्छा नहीं खेल पाई थी। लेकिन विश्व चैंपियन की मौजूद जीत की वजह से उन्होंने अपने सारे गम भुला दिए हैं और सभी दर्द भूल गए हैं।

खेल के कारण बहन की शादी में भी नहीं जा सकती

जब उन्होंने विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता था तो उसके बाद उन्होंने तुरंत ही अपनी माताश्री को फोन करा था वहां अपनी माता से काफी लंबे समय से दूर थी और जीत की खबर पर वह अपने भावों को नहीं रोक पाई और खुशी के मारे चिल्लाने लगी इस जीत के अनमोल अवसर पर उन्हें अपने परिवार की बहुत याद आ रही थी लेकिन खेल की वजह से वह अपनी बहन की शादी में भी नहीं जा पाई थी जिसका उन्हें गम भी था लेकिन जित के बाद उन्हें किसी भी बात का मलाल नहीं था।

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