उत्तराखंड के प्राची’न मंदिर: जो बनाते है उत्तराखंड को देव’भूमि।

पर्यटन

हिमालय की गोद में बसा उत्तराखंड देवभूमि के नाम से जाना जाता है, जो कई हिन्दू दे’वी-देव’ताओं का निवास स्थान है। साल भर यहां सैलानियों के साथ श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है। मनमोहक प्राकृतिक आकर्षणों, घने जगंलों और हिम पर्वतों से घिरा उत्तराखंड विश्व पटल पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है। प्राकृतिक और सांस्कृतिक रूप से यह राज्य काफी ज्यादा मायने रखता है।

उत्तराखंड के प्राची’न मंदिर

आज इस खास लेख में उत्तराखंड के मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका संबंध पौराणिक काल से बताया जाता है, जहां रोजाना दूर-दराज के श्रद्धालुओं का आगमन होता है। यहां तक की देशी-विदेशी सैलानी भी यहां आने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं

केदारनाथ


केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

बद्रीनाथ


बद्रीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं एवं जैनो का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। यह धाम जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को भी समर्पित है। वैसे इसका नाम शास्त्रों – पुराणों में बदरीनाथ है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। हल्द्वानी रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रुद्रप्रयाग में मिल जाते है। रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रुद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है।

हरिद्वार

हरिद्वार, उत्तराखण्ड के हरिद्वार जिले का एक पवित्र नगर तथा हिन्दुओं का प्रमुख तीर्थ है। यह नगर निगम बोर्ड से नियंत्रित है। यह बहुत प्राचीन नगरी है। हरिद्वार हिन्दुओं के सात पवित्र स्थलों में से एक है। ३१३९ मीटर की ऊंचाई पर स्थित अपने स्रोत गोमुख (गंगोत्री हिमनद) से २५३ किमी की यात्रा करके गंगा नदी हरिद्वार में मैदानी क्षेत्र में प्रथम प्रवेश करती है, इसलिए हरिद्वार को ‘गंगाद्वार’ के नाम से भी जाना जाता है; जिसका अर्थ है वह स्थान जहाँ पर गंगाजी मैदानों में प्रवेश करती हैं। हरिद्वार का अर्थ “हरि (ईश्वर) का द्वार” होता है। पश्चात्कालीन हिंदू धार्मिक कथाओं के अनुसार, हरिद्वार वह स्थान है जहाँ अमृत की कुछ बूँदें भूल से घड़े से गिर गयीं जब धन्वन्तरी उस घड़े को समुद्र मंथन के बाद ले जा रहे थे। ध्यातव्य है कि कुम्भ या महाकुम्भ से सम्बद्ध कथा का उल्लेख किसी पुराण में नहीं है। प्रक्षिप्त रूप में ही इसका उल्लेख होता रहा है। अतः कथा का रूप भी भिन्न-भिन्न रहा है। मान्यता है कि चार स्थानों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं। वे स्थान हैं:- उज्जैन, हरिद्वार, नासिक और प्रयाग। इन चारों स्थानों पर बारी-बारी से हर १२वें वर्ष महाकुम्भ का आयोजन होता है। एक स्थान के महाकुम्भ से तीन वर्षों के बाद दूसरे स्थान पर महाकुम्भ का आयोजन होता है।
एक मान्यता के अनुसार वह स्थान जहाँ पर अमृत की बूंदें गिरी थीं उसे हर की पौड़ी पर ब्रह्म कुण्ड माना जाता है। ‘हर की पौड़ी’ हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है और पूरे भारत से भक्तों और तीर्थयात्रियों के जत्थे त्योहारों या पवित्र दिवसों के अवसर पर स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। यहाँ स्नान करना मोक्ष प्राप्त करवाने वाला माना जाता है।

मदमहेश्वर

पंचकेदारों में मदमहेश्वर दूसरा केदार है। मान्यता है कि आदि केदारेश्वर भगवान शिव की नाभि का पूजन यहां होता है। शिव के मध्यभाग के दर्शन के कारण इसे मदमहेश्वर नाम मिला। यहां मौजूद शिवलिंग की आकृति नाभि के समान ही है। केदारघाटी के कालीमठ से होकर यहां जाने के कारण विषम भौगोलिक परिस्थितियां यहां तीर्थयात्रियों की संख्या सीमित कर देती है। यहां जाने के लिए रुद्रप्रयाग से केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग से ऊखीमठ पहुंचना होता है। ऊखीमठ से उनियाणा गांव तक मोटर मार्ग से पहुंचा जाता है। इसके बाद रांसी गौंडार गांव से 10 किलोमीटर की चढ़ाई पार कर भगवान मदमहेश्वर के मंदिर तक पहुंचना होता है। यहां के लिए दूसरा मार्ग गुप्तकाशी से भी है, जहां से कालीमठ तक वाहन से जाने के बाद आगे पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है, यह ट्रैकिंग रूट काफी रमणीक है।

रुद्रनाथ

रुद्रनाथ देश का पहला तीर्थ है जहां भगवान शिव के मुखाकृति के दर्शन होते हैं। इसे पितरों का तारण करने वाला श्रेष्ठ तीर्थ माना जाता है। इस साल 19 मई को इस तीर्थ के कपाट खुल चुके हैं। कहा जाता है कि रुद्रनाथ तीर्थ में ही देवर्षि नारद ने भगवान शंकर को कनखल (हरिद्वार) में दक्ष प्रजापति द्वारा यज्ञ कराने के दौरान देवी सती के दाह की सूचना दी थी। रुद्रनाथ में ही नारद को भगवान शिव ने नाद ब्रहम, पिण्डोत्पत्ति, रागोत्पत्ति, संगीतशास्त्र, गीत शास्त्र एवं श्रृंगार शास्त्र का ज्ञान दिया। भगवान रुद्रनाथ यहां गुफा में विराजते हैं। यह विशाल गुफा दो खंडों में है। भगवान रुद्रेश्वर का दर्शन, निर्वाण एवं श्रृंगार, दोनों रूपों में होता हे। कुछ बायीं ओर झुकी मूर्ति मुखमुद्रा यह प्रदर्शित करती है कि भगवान नीलकंठ प्रसन्न मुद्रा में विचारवान हैं। रुद्रनाथ तीर्थ देवताओं के लिए भी दुर्लभ माना जाता है। केदारनाथ के रूप में इस तीर्थ को चतुर्थ केदार कहा जाता है। सती द्वारा दक्ष प्रजापति के यज्ञ में योगाग्नि द्वारा भस्म होने पर भगवान शंकर क्रोध में थे। देवर्षि नारद ने उन्हें यह सूचना दी। सूचना मिलते ही भगवान शंकर ने अपने जटाजूट से केश उखाड़कर पटक डाले। जिस स्थान पर यह केश गिरे उससे नन्दी, वीरभद्र आदिगण प्रकट हुए। उन्होंने दक्ष प्रजापति का यज्ञ भंग कर दिया। रुद्रनाथ पहुंचने के लिए पहला मार्ग गोपेश्वर के ग्राम ग्वाड़-देवलधार, किन्नखोली-किन महादेव होते हुए, दूसरा मार्ग मण्डल चट्टी-अत्रि अनुसूइया आश्रम होते हुए, तीसरा मार्ग गोपेश्वर सगर ज्यूरागली-पण्डार होते हुए, चौथा मार्ग ग्राम देवर मौनाख्य- नौलाख्य पर्वत पंडार खर्क होते हुए जाता है।

बैजनाथ मंदिर

बैजनाथ मंदिर कुमाऊ कत्युरी राजा द्वारा बागेश्वर जिले में करीब 1150 इसवी में गोमती नदी के किनारे पर बनाया गया था । यह मंदिर 1126 मीटर की ऊंचाई पर गोमती नदी के बाएं किनारे पर स्थित है | यह मंदिर विशाल पाषण शिलाओं से बनाया गया है। बैजनाथ में यात्रा करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण जगहों में से एक 12 वी सदी में बना ऐतिहासिक एवम महत्वपूर्ण “बैजनाथ मंदिर” है | ऐसी मान्यता है कि शिव और पार्वती ने गोमती व गरुड़ गंगा नदी के संगम पर विवाह रचाया था |बैजनाथ को पहले “कार्तिकेयपुर” के नाम से जाना जाता था , जो कि 12वीं और 13वीं शताब्दी में कत्यूरी वंश की राजधानी हुआ करती थी । शिव वैद्यनाथ के लिए समर्पित, भगवान के चिकित्सकों, बैजनाथ मंदिर वास्तव में एक मंदिर है , जो कि शिव, गणेश, पार्वती, चंदिका, कुबेर, सूर्य और ब्रह्मा की मूर्तियों के साथ कत्युरी राजाओं द्वारा बनाया गया है । इसके अलावा बैजनाथ शहर भी मंदिर से अपना नाम रखता है। महंत के घर के ठीक नीचे मुख्य मंदिर के रास्ते में ब्राह्मणी मंदिर है | जिसके बारे में पौराणिक कथा यह है कि मंदिर में एक ब्राह्मण महिला द्वारा निर्मित शिवलिंग भगवान शिव को समर्पित था

सीता वाणी मंदिर

 

सीता बनी मंदिर भगवान राम की पत्नी देवी सीता को समर्पित है ऐसा माना जाता है कि उन्हें यहां धरती माता की गोद में प्रवेश किया हर साल रामनवमी के दौरान यहां मेला लगता है यह रामनगर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस मेले में सम्मिलित होने के लिए दूर-दूर भारत के राज्यों से आते हैं इसीलिए रामनगर में इसे एक महत्वपूर्ण पर्यटन फल माना जाता है

पाताल भुवनेश्वर

 

पिथौरागढ़ जनपद उत्तराखंड राज्य का प्रमुख पर्यटक केन्द्र है। यहां देवदार के घने जंगलों के बीच यहां पर अनेक भूमिगत गुफ़ाओं का संग्रह है जिसमें से एक बड़ी गुफ़ा के अंदर शंकर जी का मंदिर स्थापित है। यह संपूर्ण परिसर 2007 से भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा अपने कब्जे में लिया गया है। हालांकि गुफ़ाओं के अन्दर प्रवेश आदि का कार्य अब भी स्थानीय स्तर पर बनी मंदिर कमेटी द्वारा किया जाता है। पाताल भुवनेश्वर निवासी मेजर समीर कोतवाल 28 अगस्त 1999 को आसाम में उग्रवादियों के एक गुट के साथ लडाई में शहीद हो गये थे। दिवंगत मेजर समीर कोतवाल की स्मृति में पाताल भुवनेश्वर कस्बे के प्रवेश द्वार को ‘समीर द्वार’ का नाम दिया गया है। पर्यटकों की सुविधा हेतु कुमाऊँ मण्डल विकास निगम का गेस्ट हाउस है।

महासू देवता मंदिर, हणोल

हणोल का महासू देवता मंदिर अथवा महासू महादेव मंदिर का निर्माण हूण राजवंश के नेता मिहिरकुल हूण ने करवाया था। हणोल गांव ,जौनसार बावर, उत्तराखंड में स्थित यह मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं व कला और संस्कृति की अनमोल धरोहर है। कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था। यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भट का अर्थ योद्धा होता हैं।

बालेश्वर मन्दिर

उत्तराखण्ड राज्य के चम्पावत नगर में स्थित बालेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्राचीन मंदिर समूह है, जिसका निर्माण १०-१२ ईसवीं शताब्दी में चन्द शासकों ने करवाया था। इस मंदिर की वास्तुकला काफी सुंदर है। मन्दिर समूह चम्पावत नगर के बस स्टेशन से लगभग १०० मीटर की दूरी पर स्थित है।

लाखामंडल

प्रकृति की वादियों में बसा यह गांव भारत देश के उत्तराखंड राज्य के पाटनगर देहरादून से 128 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यमुना नदी की तट पर है। दिल को लुभाने वाली यह जगह गुफाओं और भगवान शिव के मंदिर के प्राचीन अवशेषों से घिरा हुआ है। माना जाता है कि इस मंदिर में प्रार्थना करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां पर खुदाई करते वक्त विभिन्न आकार के और विभिन्न ऐतिहासिक काल के शिवलिंग मिले हैं।

जोशीमठ

जोशीमठ या ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड राज्य में स्थित एक नगर है जहाँ हिन्दुओं की प्रसिद्ध ज्योतिष पीठ स्थित है।। यहां ८वीं सदी में धर्मसुधारक आदि शंकराचार्य को ज्ञान प्राप्त हुआ और बद्रीनाथ मंदिर तथा देश के विभिन्न कोनों में तीन और मठों की स्थापना से पहले यहीं उन्होंने प्रथम मठ की स्थापना की। जाड़े के समय इस शहर में बद्रीनाथ की गद्दी विराजित होती है जहां नरसिंह के सुंदर एवं पुराने मंदिर में इसकी पूजा की जाती है। बद्रीनाथ, औली तथा नीति घाटी के सान्निध्य के कारण जोशीमठ एक महत्त्वपूर्ण पर्यटन स्थल बन गया है।

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