अगर बना रहे है। केदार’नाथ घूमने का प्लान तो जानिए इन स्थानों के बारे में जो आपकी यात्रा को बनाएंगे स’फल।

पर्यटन प्रकृति

बर्फ से ढंके हिमालय के पहाड़, एक 1000 साल पुराने मंदिर में गहरी भावनाएं, एक दिव्य आभा, यह केदारनाथ- दे’वताओं की भूमि है। केदारनाथ पवित्र मंदाकिनी नदी के स्रोत के करीब 3584 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। सत्य युग से राजा केदार के नाम पर, केदारनाथ चार छोटा धाम में से एक है जिसमें बद्रीनाथ, गंगोत्री, और यमुनोत्री भी शामिल हैं। हर कोई, अपने जीवनकाल में, एक बार पृथ्वी पर सबसे पवित्र स्थानों में से एक को अवश्य दर्शन देता है। जाने से पहले, केदारनाथ में घूमने के लिए इन 10 सबसे अच्छे स्थानों पर ध्यान दें।

“केदारनाथ”


केदारनाथ मन्दिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। उत्तराखण्ड में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ चार धाम और पंच केदार में से भी एक है। यहाँ की प्रतिकूल जलवायु के कारण यह मन्दिर अप्रैल से नवंबर माह के मध्य ही दर्शन के लिए खुलता है। पत्थरों से बने कत्यूरी शैली से बने इस मन्दिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण पाण्डव वंश के जनमेजय ने कराया था। यहाँ स्थित स्वयम्भू शिवलिंग अति प्राचीन है। आदि शंकराचार्य ने इस मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया। इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

“बद्रीनाथ”


बद्रीनाथ भारत के उत्तरी भाग में स्थित एक स्थान है जो हिन्दुओं एवं जैनो का प्रसिद्ध तीर्थ है। यह उत्तराखण्ड के चमोली जिले में स्थित एक नगर पंचायत है। यहाँ बद्रीनाथ मन्दिर है जो हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध धामों में से एक है। यह धाम जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को भी समर्पित है। वैसे इसका नाम शास्त्रों – पुराणों में बदरीनाथ है। बदरीनाथ जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। हल्द्वानी रानीखेत से, कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से ओर हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते रुद्रप्रयाग में मिल जाते है। रुद्रप्रयाग में मन्दाकिनी और अलकनन्दा का संगम है। जहां दो नदियां मिलती है, उस जगह को प्रयाग कहते है। बदरी-केदार की राह में कई प्रयाग आते है। रुद्रप्रयाग से जो लोग केदारनाथ जाना चाहतें है, वे उधर चले जाते है।

“तुंगनाथ”

अगर आप जनवरी माह में कहीं ट्रैवलिंग का प्लान बना रहे हैं और जगह कुछ अलग ही तलाश कर रहे हैं। यानी कि यह ट्रिप रिलीजियस भी और हो और मस्तीभरी भी हो तो ऐसे में आप ‘तुंगनाथ’ मंदिर के लिए ट्रिप प्लान कर सकते हैं।
किसी ऐसी जगह के बारे में जहां पर आप बर्फबारी का भी मजा ले सकें और अध्यात्म से भी रूबरू हो सके। तो हो गई न शानदार ट्रिप एक ही टाइम पर। आज हम आपको ऐसी ही जगह के बारे में बताने जा रहे हें जहां पहुंचकर आपको लगेगा जन्‍नत कहीं है तो बस यहीं। ‘तुंगनाथ’ उत्तराखंड के गढ़वाल के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित एक पर्वत है। इसी पर्वत पर स्थित है ‘तुंगनाथ मंदिर।’ यह भोलेनाथ के पंच केदारों में से एक है।

“वासुकी झील”


समुद्री तल से 4,150 मीटर की ऊंचाई पर शांत वातावरण में स्थित इस झील से चौखंबा चोटी एवं मंदाकिनी घाटी के आकर्षक परिदृश्य दिखाई देता है। केदारनाथ से वासुकी ताल अथवा वासुकी झील तक की निरंतर चढ़ाई, उसे बेहतरीन ट्रैक बनाती है। पहली बार ट्रैकिंग करने वालों के लिए गौरीकुंड से इस झील तक का ट्रैक बेहद उपयुक्त है। 24 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करने के लिए आपके पास अगर समय की कमी है अथवा हिम्मत नहीं है तो टट्टू की सवारी करके आप सबसे पहले गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक पहुंच सकते हैं।

“सोनप्रयाग”


सोनप्रयाग 1829 मी की ऊँचाई पर केदारनाथ से 19 किमी की दूरी पर स्थित है। यह वह स्थान है जहां पर बासुकी और मन्दाकिनी नदियाँ आपस में मिलती हैं। केदारनाथ के मार्ग पर स्थित अपने नदियों के पवित्र जल के कारण इस स्थान का अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ऐसा मानना है कि सोनप्रयाग के जल का स्पर्श मात्र ही बैकुण्ठ धाम की प्रथम सीढ़ी है।

“शंकराचार्य समाधि”


केदारनाथ मंदिर के थोड़ा पीछे आदि गुरु शंकराचार्य की समाधि स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि इसी संत ने भारत में चार पावन धामों की स्थापना की थी, जो हिंदुओं के लिए महत्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। इस प्रसिद्ध हिंदू दार्शनिक को 32 वर्ष की युवावस्था में निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि शंकराचार्य स्वयं ही धरती में समाहित हो गए थे। हज़ारों की संख्या में श्रद्धालुगण यहां पर आते हैं, केदारनाथ में शंकराचार्य की समाधि बेहद लोकप्रिय पर्यटक आकर्षणों में से एक है।

“गौरीकुंड”


एक प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थयात्रा है , जो कि उखिमठ से 28 कि.मी और सोनप्रयाग से 5 कि.मी की दुरी पर समुन्द्र तल से 1982 की ऊँचाई पर देवभूमि उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले में मन्दाकिनी नदी के तट पर स्थित है | ऐतिहासिक दृष्टि से गौरीकुंड प्राचीन काल से विद्यमान है | यहाँ से केदारनाथ मंदिर की दूरी 14 किलोमीटर है , जो पैदल अथवा घोड़े , डाँडी या कंडी में तय की जा सकती हैं । इस स्थान से केदारनाथ के लिए पैदल रास्ता प्रारंभ होता है | यह कुंड गढ़वाल हिमालय में 6000 फीट की एक प्रभाव्स्शाली ऊँचाई पर स्थित है | पहाड़ी इलाको का भव्य नज़ारा और कुंड के निकट बहती वासुकी गंगा के चारो ओरे उज्जवल हरियाली देखने के लिए एक आकर्षक जगह है!

“त्रियुगीनारायण मंदिर”


उत्तराखंड जो ऐसे ही कई धार्मिक और पौराणिक कथाओं के लिए प्रसिद्ध है । यहाँ के कई स्थल सिर्फ पर्यटक स्थल के रूप में ही नहीं , पवित्र तीर्थस्थलों के रूप में भी लोकप्रिय हैं। ऐसा ही एक स्थल रुद्रप्रयाग में स्थित है जिसे “त्रियुगीनारायण मंदिर” से नाम से जाना जाता है | यह मंदिर काफी प्रसिद्ध एवम् लोकप्रिय माना जाता है | उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर ही वह पवित्र और विशेष पौराणिक मंदिर है और यह रुद्रप्रयाग के प्रमुख स्थानों में से एक मुख्य स्थल है । यह स्थान रुद्रप्रयाग जिले का एक भाग है | यह मंदिर उत्तराखंड की वादियों के बीच अत्यधिक आकर्षित नज़र आता है | चारो तरफ हरयाली के बीच में स्थित मंदिर में आये हुए यात्रीयो , भक्तो के लिए यह मंदिर एक शांतिमय और सुरमय समां बाँध देता है | त्रियुगीनारायण मंदिर की खूबसूरती आँखों को काफी ठंडक पहुचाती है।

“गुप्तकाशी”


गुप्तकाशी का काशी की तरह काफी महत्व है प्राचीन विश्वनाथ मंदिर, अर्धनारेश्वर मंदिर और मणिकर्णिक कुंड, जहां गंगा और यमुना के दो नदियों को मिलना माना जाता है, गुप्तकाशी में मुख्य आकर्षण हैं। यह माना जाता है कि महाभारत की लड़ाई के बाद, पांडव भगवान शिव से मिलना चाहते थे और अपने आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव गुप्काशी से केदारनाथ जाकर छिप गए , क्योंकि वे पांडवों से नहीं मिलना चाहते थे, इसका कारण यह कि वे सही कारणों के लिए लड़े थे, किन्तु वे अपने वंश को नष्ट करने के लिए जिम्मेदार थे।

“चोराबाड़ी ताल”


चोराबाड़ी ताल समुद्रतल से 3900 मी की ऊँचाई पर चोराबाड़ी बमक हिमनदी के मुहाने पर स्थित है। केदारनाथ और कीर्ति स्तम्भ चोटियों की तलहटी में स्थित यह स्थान हिमालय की चोटियों का शानदार दृश्य प्रस्तुत करता है। इस ताल में महात्मा गाँधी की अस्थियों को विसर्जित किया गया था इसलिये इसे गाँधी सरोवर के नाम से भी जाना जाता है।
लोककथाओं के अनुसार यह वही झील है जहाँ से पाँण्डवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर ने स्वर्ग के लिये प्रस्थान किया था। इस स्थान तक 3 किमी की पैदल यात्रा द्वारा पहुँचा जा सकता है। केदारनाथ का लोहे का पुल सीधे गाँधी सरोवर तक ले जाता है जिसके आधे रास्ते में खड़ंजा अच्छी तरह से बिछाया गया है। रास्ते में यात्री सुन्दर झरने को देख सकते हैं। इस जगह के बदलते मौसम के कारण लोगों को यहाँ सुबह जल्दी आने की सलाह दी जाती

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