केदारनाथ से पहले होती है भुकुंट भैरव जी की पूजा शीतकाल में करते हैं वो मंदिर की रखवाली

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हिंदू धर्म में कई मान्यताएं सदियों से चली आ रही हैं। भगवान शिव की बात करें तो उनका हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और कई भक्त दूर-दूर से भगवान शिव के सिद्ध मंदिरों के दर्शन के लिए आते हैं। भगवान शिव के दर्शन से जुड़ी एक बहुत ही महत्वपूर्ण मान्यता है जो सदियों से चली आ रही है और आज भी लोग इसका पालन कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे भगवान के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके दर्शन के बिना भगवान शिव को देखना अधूरा और निरर्थक माना जाता है। जिस देश में भगवान शिव का सिद्ध मंदिर है, वहां काल भैरव जी का मंदिर भी है और माना जाता है कि काल भैरव मंदिर में बिना भगवान शिव के दर्शन करना अधूरा और अमान्य है। भुकंट बाबा को केदारनाथ का पहला रावल माना जाता है। उन्हें यहां का क्षेत्र रक्षक माना जाता है। बाबा केदार की पूजा करने से पहले केदारनाथ भुकंट बाबा की पूजा करने का विधान है और उसके बाद विधि-विधान से केदारनाथ मंदिर के द्वार खोले जाते हैं।

स्‍थानीय लोग बताते हैं कि वर्ष 2017 में मंदिर समिति और प्रशासन के लोगों को कपाट बंद करने में काफी परेशानी हुई थी। कपाट के कुंडे लगाने में दिक्‍कत हो रही थी औ‍र फिर उसके बाद पुरोहितों ने भगवान केदार के क्षेत्रपाल भुकुंट भैरव का आह्वान किया तो कुछ ही समय के बाद कुंडे सही बैठ गए और ताला लग गया। यहां शीतकाल में केदारनाथ मंदिर की सुरक्षा भुकुंट भैरव के भरोसे ही रहती है। भारत में भगवान शिव के कई प्रसिद्ध सिद्ध मंदिर हैं। काशी के बाबा विश्वनाथ हों या फिर उज्जैन के बाबा महाकाल, सभी स्थानों पर मशहूर काल भैरव का मंदिर है। शिवभक्त काल भैरव मंदिर के दर्शन किए बगैर शिव के दर्शन को अधूरा मानते हैं और जब भक्त भगवान शिव के दर्शन के बाद काल भैरव के मंदिर पर सिर झुकाते हैं तभी उनकी तीर्थ यात्रा पूरी मानी जाती है। उत्तराखंड में केदारनाथ भगवान शिव का जहां वास है वहां भी कुछ ऐसी ही परंपरा चली आ रही है। केदारनाथ में भी बाबा भैरव का भुकुंट भैरव नाथ मंदिर है और हर साल केदारनाथ के कपाट खोलने से पहले भैरव मंदिर में रीति-रिवाज के साथ पूजा-पाठ की जाती है। ऐसा माना जाता है भुकुंट भैरव मंदिर के दर्शन किए बगैर किसी की भी केदारनाथ यात्रा पूरी नहीं हो सकती और हर साल केदारनाथ के कपाट खुलने से पहले पुजारी भुकुंट भैरवनाथ की पूजा करते हैं। आइए आपको बताते हैं कि भगवान भैरव के मंदिर में ऐसा क्या खास है और क्यों केदारनाथ की यात्रा इस मंदिर के बिना अधूरी मानी जाती है।

 

भुकुंट बाबा को शंकर का रुद्रावतार माना जाता है। उनको केदारनाथ का पहला रावल माना गया है उन्हें यहां का क्षेत्रपाल भी माना जाता है। परंपरा है कि बाबा केदारनाथ की पूजा से पहले और केदारनाथ के कपाट खुलने से पहले भी केदारनाथ में स्थित भुकुंट भैरव मंदिर में काल भैरव की पूजा की जाती है। पूजा पूरे रीति-रिवाज के साथ संपन्न होने के बाद केदारनाथ मंदिर के कपाट खोलने की तैयारी की जाती है। भैरव बाबा का यह मंदिर केदारनाथ मंदिर से तकरीबन आधा किलोमीटर दूर स्थित है। भैरव को भगवान शिव का एक अटूट अंग माना गया है और पुजारियों के अनुसार हर साल यह परंपरा है कि मंदिर के कपाट खोले जाने से पहले मंगलवार और शनिवार के शुभ दिन ही भैरवनाथ की पूजा की जाती है। इस बात का जिक्र वेदों और पुराणों में भी मिलता है कि बाबा भैरव के दर्शन के बगैर भगवान शिव के दर्शन करना अधूरा है।

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