देवभूमि की मां चन्द्रबदनी..अप्सराओं, गंधर्वों और ये सिद्धपीठ भरा हे कई अनसुलझे रहस्यों से

धर्म शहर

देवभूमि प्राचीन काल से ही आस्था और कौतुहल का मुख्य केन्द्र रही है। यहां कदम कदम कुछ ऐसे देवस्थान हैं, जहां की कहानियां आस्था को और भी ज्यादा मजबूत कर देती हैं. आज हम आपको एक ऐसे ही सिद्धपीठ के बारे में बताने जा रहे हैं, जो वास्तव में रह”स्यों” का केन्द्र भी है। दरअसल ये एक ऐसा मंदिर है, जिसके बारे में मान्यताएं हैं यहां रात को गंधर्व और अप्सराएं नृत्य करती हैं। अब ये बात सच है या झूठ, लेकिन लोकमान्यताओं की भी अपनी एक जगह होती है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की चन्द्रबदनी पट्टी में मां भगवती का पौराणिक मन्दिर है। इसे चन्द्रबदनी के नाम से जाना जाता है। चन्द्रकूट पर्वत पर स्थित इस सिद्धपीठ को दुनिया प्रणाम करती है। ये चोटी बांज‚ बुरांस‚ काफल और देवदार वृक्षों से घिरी है। कहा जाता है कि पहले यहां पशुबली दी जाती थी। किन्तु कुछ समय पहले इसे बन्द कर दिया गया‚ जिसका श्रेय श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम के स्वामी स्वo मनमथन को जाता है। अब यहां पर सात्विक विधि–विधान श्रीफल‚ छत्र‚ फल‚ पुष्प आदि द्वारा पूजा की जाती है। अब इस सिद्धपीठ की कहानी भी आपको बताते हैं।इस शक्तिपीठ के बारे में कहा जाता है कि एक बार राजा दक्ष ने हरिद्वार (कनखल) में यज्ञ कि

हरिद्वार (कनखल)

दक्ष की छोटी लड़की सती चाहती थी कि भगवान शंकर यज्ञ में जाएं, फिर भी भगवान शंकर ने उन्हें वहाँ न जाने का वचन दिया। मोहवश सती ने उनके शब्दों को समझ नहीं पाया और वहां चली गईं। सती और उनके अन्य महत्वपूर्ण शिवाजी वहां नाराज थे। पिता के घर में अपने आप को और अपने बेहतर आधे को देखकर सती आग के गड्ढे में गिर गई और अपनी जान दे दी। इस बिंदु पर जब भगवान शिव को इस बारे में डेटा मिला, तो उन्होंने दिन के अंत में दक्ष के यज्ञशाला में जाकर सती के शरीर को प्राप्त किया और आकाश से हिमालय की ओर टहल गए। सती के वियोग से वे दयनीय और विक्षुब्ध हो गए, जिससे पृथ्वी थरथरा गई। कहा जाता है कि पुरुषत्व के भय के कारण, भगवान विष्णु ने अपने चक्र से सती के अंगों को हटा दिया। शक्तिपीठ की स्थापना की गई जहाँ सती के टुकड़े भगवान विष्णु के पहिये से टकरा गए। जैसे जहां सिर गिरा, उसका नाम सुरकंडा था। कुच (बोसोम) जहां यह गिर गया उसका नाम कुंजापुरी था। अनिवार्य रूप से, सती का मध्य (शरीर) चंद्रकूट पर्वत पर पाया गया था, बाद में यहां चंद्रबदनी का नाम पड़ा। यहां के मौलवियों ने व्यक्त किया है कि यह अभयारण्य एक मूर्तिकला नहीं है, लेकिन श्रीयन्त्र है। यहाँ के मंत्री अपनी आँखें बंद करके या आँखें घुमाकर श्रीयांत्र को कुछ वस्त्र पहनाते हैं। यह कहां जाता है कि यहां जीवन में एक टन मिलता है और वास्तविक मस्तिष्क के साथ मां पर बरसता है।

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