पति के देहांत के बाद कलाकार दुलारी देवी को घर चलाने के लिए करना पड़ा लोगों के घर झाड़ू पोछा ,पदम श्री से सम्मानित किया है सरकार ने

समाचार समाज

जब किसी महिला के पति का देहांत हो जाता है तो उसके बाद में उसकी स्थिति समझ पाना बेहद मुश्किल है क्योंकि वह उस कड़ी पीड़ा से गुजर रही होती है उसकी आप कभी कल्पना भी नहीं कर सकते और आप सोचिए अगर वह गरीब परिवार की हो तो उसके ऊपर जिम्मेदारियों का कितना वजन पड़ जाता है। वहां इन जिम्मेदारियों के तले किस तरीके से आगे जाकर अपने परिवार को चला पाएंगे सबसे बड़ी घटनाएं आपके सामने यही आती हैं।

दुलारी देवी (Dulari Devi) राजनगर प्रखंड के अत्यधिक गरीब हमारा परिवार से सम्बंध रखने वाली दुलारी देवी ने बचपन से ही कष्ट झेले और उम्र के साथ कष्टों का यह सिलसिला बढ़ता ही गया। फिर इनके जीवन में एक नया मोड़ आया और इनकी कला के रंग चारों तरफ़ फैल गए।

सिर्फ 12 साल की आयु में विवाह हुआ और 7 वर्ष बाद मायके वापस आ गयीं

दुलारी देवी (Dulari Devi) जब केवल 12 साल की थी तभी उनका विवाह कर दिया गया था, पर दुर्भाग्य से उनके विवाह का यह बंधन 7 वर्ष में ही ख़त्म हो गया। विवाह के सात साल बाद ही दुलारी देवी अपने मायके में वापस आ गई और वह भी 6 महीने की बेटी की मौत के ग़म के साथ। वे अशिक्षित थीं, तो कहीं नौकरी भी नहीं कर सकती थीं, इसलिए उन्होंने घर चलाने के लिए घरों में झाड़ू-पोछा करने का काम शुरू कर दिया, जिससे उनकी ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी।

7 हज़ार मिथिला पेंटिंग बना चुकी हैं Dulari Devi, किताबों में भी छपी उनकी पेंटिंग्स और जीवन गाथा

दुलारी देवी (Dulari Devi) का पेंटिंग बनाने का यह सिलसिला जारी है और अभी तक में 7000 मिथिला पेंटिंग (Mithila Painting) बना चुकी हैं। इतना ही नहीं उनके जीवन संघर्ष की गाथा गीता वुल्फ की पुस्तक ‘फॉलोइंग माइ पेंट ब्रश’ और मार्टिन लि कॉज की फ्रेंच में लिखी एक पुस्तक में भी लिखी गई है। कई बुक्स में भी उनकी पेंटिंग्स छपी हैं जैसे इग्नू (IGNOU) के मैथिली पाठ्यक्रम में भी उनकी पेंटिंग्स दी गई हैं और ‘सतरंगी’ नामक पुस्तक में भी उनकी बनाई पेंटिंग छापी गयी है।

एपीजे अब्दुल कलाम और मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने भी की थी सराहना

दुलारी देवी (Dulari Devi) की चित्रकला सारे देश में बहुत दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गई यहाँ तक की पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने भी उनके पेंटिंग कला की बहुत तारीफ की थी। इसके अलावा बिहार की राजधानी पटना में जिस समय बिहार संग्रहालय का उद्घाटन हुआ था तब तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी दुलारी देवी को इस ख़ास मौके पर आमंत्रण दिया था। वहाँ पर कमला नदी की पूजा पर बनाई गई इन्हीं की एक पेंटिंग है।

मशहूर कलाकार कर्पूरी देवी से हुईं प्रेरित

इसी दौरान दुलारी देवी (Dulari Devi) के जीवन में एक नया मोड़ आया जब उन्हें मिथिला पेंटिंग (Mithila Penting) की मशहूर कलाकार कर्पूरी देवी के घर में झाड़ू-पोंछा करने का काम मिला। बस इसके बाद ज़िन्दगी में बहुत बदलाव आ गया। उनके अंदर जो कला की प्रतिभा छुपी हुई थी वह बाहर आने लगी। जब भी दुलारी देवी फ्री रहती थी तो अपने घर के आंगन को मिट्टी से लीपकर और एक लकड़ी की सूची बनाकर उस आंगन को मधुबनी पेंटिंग से सजा देती थीं। इसके बाद उनकी यह कला रुकी नहीं, उन्होंने बहुत सारी पेंटिंग्स बनाई।

राज्य पुरस्कार और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हुईं

जहाँ कभी दुलारी देवी (Dulari Devi) रोजाना ग़रीबी की मार से लड़ते हुए जीवन बिता रही थीं, वहीं उनकी कला ने उन्हें एक ऐसा मुकाम दिला दिया जिसके बारे में अक्सर लोग सोचते ही रह जाते हैं। उन्हें वर्ष 2012-13 में राज्य पुरस्कार दिया गया और फिर 54 साल की आयु में उन्हें देश के चौथे सर्वोच्च सम्मान पद्म श्री से नवाजा गया, जो ना सिर्फ़ दुलारी देवी और उनके परिवार के लिए बल्कि, सारे भारत देश के लिए गौरव की बात है।

अपने जीवन में अनवरत संघर्षों को झेलने के बाद, दुलारी देवी (Dulari Devi) ने अपने हाथों के जादू से अपनी क़िस्मत को ख़ुद बदला। उनके जीवन से सभी को प्रेरणा मिलती है कि हर परिस्थिति में इंसान को घबराने की बजाय हिम्मत रखनी चाहिए, तो उसका भाग्य अवश्य बदलता है।

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