बचपन में ही छूटा पिता का साया, मां ने संभाल, आज बनी सिक्किम की पहली महिला आईपीएस अफसर

समाचार समाज

एक पिता का साया जब बेटी के सर पर से उठ जाता है तो उसका जीवन कितना कठिन बन जाता है इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उसकी पीड़ा समझने के लिए केवल वही व्यक्ति समझ सकता है। जो कि ऐसी ही पीड़ा से गुजरा हो लेकिन उनकी मां ने इनका हौसला कभी टूटने नहीं दिया और उनकी पढ़ाई को पूरी कराते हुए उन्हें इस काबिल बनाया कि आज उन्होंने उनका नाम गर्व से ऊंचा कर दिया है और अपनी मां का नाम गर्व से उठा दिया है। कि बेटा तो घर का चिराग होता है। पिता ना हो तो वही घर संभालता है, पर ऐसा बिल्कुल नहीं है। बेटीयों को बस एक मौके की ज़रूरत होती है। उन्हें एक अवसर मिल जाये तो वे बेटों से ज़्यादा तरक्क़ी करके दिखाती हैं।

इसी बात को चरितार्थ किया है सिक्किम की अपराजिता राय (IPS Aparajita Rai) ने, जिन्होंने पिता की मृत्यु होने के बाद भी बहुत संघर्ष किया और मेहनत कर IPS officer बनीं। चलिये जानते हैं इनकी प्रेरणादायक कहानी…

सिक्किम की 1st महिला IPS ऑफिसर बनकर रचा इतिहास

वर्ष 2011 की बात है, जब अपराजिता राय (IPS Aparajita Rai) ने IPS की परीक्षा पास करके इतिहास रच दिया। वैसे तो कई प्रतियोगी इस परीक्षा में भाग लेते हैं और पास होते हैं, लेकिन अपराजिता कि यह कामयाबी इसलिए ख़ास है क्योंकि वे सिक्किम की प्रथम महिला IPS ऑफिसर बनीं हैं। अब तक किसी भी महिला का सिलेक्शन सिक्किम में IPS की पोस्ट पर नहीं हो पाया था।

इतना ही नहीं, सिक्किम में तो सिविल सर्विसेस जैसी परीक्षाओं के बारे में किसी को ठीक प्रकार से जानकारी भी नहीं है। एक इंटरव्यू में अपराजिता ने बताया भी था कि इस पोस्ट को हासिल करने के बाद वह यह भी चाहती थी कि उनके प्रदेश सिक्किम के युवाओं को सिविल सेवाओं के बारे में जागरुक करें। जिससे अन्य व्यक्ति भी सिविल सर्विसेज में जाएँ।

जब 8 साल की थीं, तभी उठ गया था पिता का साया

अपराजिता (IPS Aparajita Rai) एक सभ्य और पढ़े लिखे परिवार से सम्बन्ध रखती हैं। उनके पिताजी डिविज़नल फॉरेस्ट ऑफिसर थे और माँ ग्रेजुएट होने के साथ अध्यापिका थीं। शुरुआत से ही एजुकेटेड माहौल मिलने से अपराजिता भी पढ़ने में काफ़ी होशियार थीं। पहले तो उनके जीवन में सब ठीक-ठाक था, फिर अचानक जब वह 8 वर्ष की थी तो उनके पिताजी की मृत्यु हो गई। ऐसी परिस्थितियों में घर की जिम्मेदारी उनकी माँ के कंधे पर आ गई।

इस घटना की वज़ह से निश्चय किया, सरकारी ऑफिसर बनेंगी

अपराजिता भी अपनी माँ का बहुत हाथ बटाती थीं। धीरे-धीरे उनके जीवन में संघर्ष बढ़ता गया और अपराजिता ने एक बेटे की तरह ही सारे कामों में अपनी माँ की मदद करना शुरू कर दिया था। बहुत बार तो कई सरकारी कामों से उन्हें कई बार सरकारी ऑफिस भी जाना पड़ता था। वे बहुत परेशान हो जाती थीं क्योंकि कितने चक्कर लगाया करती, लेकिन फिर भी काम नहीं हो पाता था।

फिर उन्होंने निश्चय किया कि वे बड़ी होकर एक गवर्नमेंट ऑफिसर ही बनेंगी और लोगों की परेशानियाँ हल करेंगी। उन्होंने सोच लिया था कि सरकारी ऑफिसों में जाकर जिस प्रकार से लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है और बार-बार ऑफिसों के चक्कर काटने पड़ते हैं, इस समस्या का निवारण में ज़रूर करेंगी तथा एक ज़िम्मेदार अफसर बनेंगी।

कई अवार्ड जीत चुकी हैं अपराजिता

अपराजिता (IPS Aparajita Rai) छोटी उम्र से ही बहुत मेहनती और होशियार रही हैं। जब वे स्कूल में पढ़ती थी तब उन्होंने स्टेट लेवल पर टॉप किया था। तब आईएससी एग्जाम में उनके 95 % अंक आये थे। उसी दौरान उन्हें ताशी नामग्याल अकादमी में बेस्ट गर्ल ऑल राउंडर श्रीमती रत्ना प्रधान मेमोरियल ट्रॉफी से भी पुरस्कृत किया गया था। इसके बाद उन्होंने अपना B.A LLB किया, फिर न्यायशास्त्र और लोक प्रशासन दोनों में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ ज्यूरिडिकल साइंसेज, कोलकाता से गोल्ड मेडल जीतकर सफलता प्राप्त की।

परंतु यह तो उनकी कामयाबी की महज़ शुरुआत ही थी। इसके बाद में भी उन्होंने बहुत से पुरस्कार जीते। जैसे कि सर्वश्रेष्ठ लेडी आउटडोर प्रोबेशनर के लिए 1958 बैच IPS अधिकारियों की ट्रॉफी, फील्ड कॉम्बैट के लिए श्री उमेश चंद्र ट्रॉफी, बेस्ट टर्न आउट के लिए वरिष्ठ कोर्स ऑफिसर्स ट्रॉफी का 55 वां बैच और बंगाली के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की ट्रॉफी इत्यादि अवॉर्ड्स उन्होंने अपने नाम किए।

पहली कोशिश में ही मिली कामयाबी

अपराजिता (IPS Aparajita Rai) ने वर्ष 2010 में पहली बार UPSC का एग्जाम दिया। पहली ही कोशिश में वह सेलेक्ट भी हो गई थीं। लेकिन रैंक बनाने के बारे में उन्होंने कुछ सोचा नहीं था, उस समय उनकी रैंक 768वीं बनी थी, जिससे वे संतुष्ट नहीं हुईं और अगले वर्ष 2011 में उन्होंने फिर से एक बार प्रयास किया, इस बार उन्होंने 358वीं रैंक प्राप्त की और IPS भी बनीं।

वर्ष 2021 में जब अपराजिता 28 वर्ष की थी, तब उन्हें आईपीएस कैडर मिला। अपराजिता ने पिता का साया बचपन में खो दिया था लेकिन इसके बावजूद भी उन्होंने कड़े संघर्ष से जूझ कर अपने सपनों को पूरा कर लिया। उनके पिताजी चाहते थे कि वह कॉरपोरेट लॉयर बने लेकिन अपराजिता ने देश सेवा के लिए एक ऐसा मुकाम चुना जो उससे भी ऊंचा था। अपराजिता सिविल ऑफिसर बनकर देश के लोगों की मदद करना चाहती थी।

आपको बता दें कि सिक्किम एक ऐसा प्रदेश था, जहाँ पर सिविल सर्विसेज के बारे में कोई जानता नहीं है और वहाँ पर आईपीएस की तैयारी से सम्बंधित सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं थी, ऐसे में अपराजिता (IPS Aparajita Rai) के लिए यह परीक्षा पास करना काफ़ी मुश्किल था परंतु फिर आत्मविश्वास और संघर्ष के साथ अपराजिता ने यह बड़ी सफलता प्राप्त कर ली।

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