पुलिस वाले बने भगवान एक छोटी से बच्ची के के लिए, बच्ची के हार्ट सर्जरी के लिए इकठ्ठे किए 5 लाख रूपए

समाज

कई बार कहा जाता है कि पुलिसवालों के सीने में दिल नहीं होता है और वे बहुत बेरहम होते हैं। दरअसल कुछ पुलिसवालों की वज़ह से लोगों ने अपनी ऐसी मानसिकता बना ली है कि वे क्रूर और हिंसक स्वभाव के होते हैं, उनमें दिल नहीं होता, पर ये बात बिल्कुल ग़लत है। इसका एक अच्छा उदाहरण है चेन्नई के नंदबक्कम पुलिस स्टेशन के हेड कांस्टेबल और वहाँ के दूसरे पुलिसकर्मी, जिन्होंने एक छोटी 5 साल की बच्ची के दिल का ऑपरेशन करवाने के लिए मिलकर 5 लाख रूपये जमा किए और उसका ऑपरेशन करवाकर उसे नई ज़िन्दगी दी।

बच्ची के दिल में जन्म से छेद था, माता पिता के पास इलाज़ के पैसे नहीं थे

जिस बच्ची के बारे में हम आपको बता रहे हैं वह गुड्डुचेरी में अपने पूरे परिवार के साथ रहती है। इनके पिता कार्तिक एक इलेक्ट्रॉनिक कम्पनी में सेल्समैन कि जॉब किया करते थे, परन्तु कोरोना कि वज़ह से जो लॉकडाउन हुआ उसमें उनकी जॉब चली गई। नौकरी ना होने के कारण उनकी आर्थिक हालत खराब चल रही थी और घरखर्च चलाने में भी मुश्किल आ रही थी। कविष्का जब पैदा हुई थी तभी से डेक्स्ट्रोकार्डिया नामक दिल की बीमारी से पीड़ित थी। ये बात उसके माता पिता जानते थे और उसका इलाज़ भी चालू था।

फिर एक दिन लॉकडाउन होने से कुछ दिनों पहले ही चिकित्सकों ने कार्तिक को कहा कि उनकी बेटी का हार्ट ऑपरेशन करवाना पड़ेगा, लेकिन बेरोजगार कार्तिक, जिनके पास ख़र्चा चलाने के पूरे पैसे नहीं थे, वे ऑपरेशन के लिए 5 लाख रूपये कहाँ से लाते? इसलिए वे कविष्का का ऑपरेशन नहीं करवा सकते थे।

इंस्पेक्टर्स ने मिलकर इकठ्ठे किए 5 लाख रूपए

जैसे जैसे समय बीत रहा था, उस बच्ची कविष्का कि तबीयत बिगड़ती जा रही थी। उसका पूरा परिवार उसके लिए चिंतित था पर पैसों का इंतज़ाम नहीं कर पा रहा था, इसलिए उसकी हार्ट सर्जरी को स्थगित किया जा रहा था। करीब दो साल पहले नंदांबक्कम पुलिस स्टेशन के हेड कांस्टेबल पी सेंथिल कुमार उनके पड़ोस में रहने आए थे। जब उन्हें ये बात पता चली तो उन्होंने और एक और पुलिसकर्मी एम थंगराज ने मिलकर 4,5000 रुपए उस बच्ची के इलाज़ के लिए ख़ुद दान किए, फिर बाक़ी की रक़म को अन्य पुलिसवालों के साथ मिलकर जमा किया। जिससे उस बच्ची की ज़िन्दगी बचाई जा सके।

करवाया बच्ची का ऑपरेशन, बचाई मासूम की जिन्दगी

इसके बाद नंदांबक्कम के एक प्राइवेट अस्पताल से में कविष्का के ऑपरेशन के लिए दिन तय किया गया और फिर उसका नियत दिन उसका ऑपरेशन हुआ। उसे 15 दिन तक अस्पताल में ही भर्ती रखा गया, बाद में 11 जुलाई को उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। अब कविष्का स्वस्थ है और उसे पुलिसवालों की वज़ह से नया जीवन मिल सका, जिसके लिए सभी खुश थे।

अगर इसी तरह से समाज में सभी लोग इंसानियत के नाते एक दूसरे की सहायता के लिए आगे आएँ तो कविष्का जैसे कई मासूमों के जीवन को बचाया जा सकता है।

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