मां के दिए हुए ₹25 लेकर आए थे शहर आज उन्ही ₹25 की बदौलत खड़ी कर दी सात हजार करोड़ की कंपनी

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परी बन के हालात ऐसे होते हैं कि कभी कोई भी व्यक्ति उसकी कल्पना नहीं कर सकता और उसे शब्दों में नहीं बता सकता हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद भी जब हम जीवन में कुछ नहीं कर पाते हैं और हार जाते हैं अपने जीवन से लेकिन इन सभी चुनौतियों के बाद भी कई लोग अपनी कोशिशों में निरंतर लगे रहते हैं और जब तक उनके जीवन में उनको सफलता नहीं मिलती वहां पर याद करते रहते हैं और एक न एक दिन उनकी मेहनत भरी कशमकश भरी जीवन का अंत होता है और उन्हें सफलता अवश्य मिलती है।

आज आपको ओबेरॉय ग्रुप (The Oberoi Group) के संस्थापक और चेयरमैन राय बहादुर मोहन सिंह ओबरॉय के जीवन की एक अहम कहानी बताने वाले हैं जिसके बारे में शायद ही देश में ज्यादा लोग जानते होंगे आज भले ही ओबेरॉय ग्रुप (The Oberoi Group) का नाम बड़े अमीर घरानों में से एक में गिना जाता है लेकिन इसकी शुरुआत करने वाले मोहन सिंह की कहानी किसी दुख भरी कहानी से कम नहीं थी और आप उनके जीवन की तो कल्पना भी नहीं कर सकते थे आइए जानते हैं आंखें इनके अतीत की आखिर क्या थी कहानी।

मोहन सिंह ओबरॉय की जीवन कथा

ओबेरॉय ग्रुप की शुरुआत मोहन सिंह ओबरॉय ने की थी इनका जन्म वर्तमान पाकिस्तान के झेलम जिले के बनाओ गांव में हुआ था वह एक सिख परिवार से संबंध रखते थे ओए ओए ओबरॉय के जीवन की परीक्षा तो मानो उनके बचपन से ही शुरू हो गई थी उन्होंने अपने बचपन से ही दुख दर्द सभी के सामने किया है और रोए के पिता का देहांत हो गया था उस वक्त वह केवल 6 महीने के लिए थे इसीलिए उनके पालन पोषण और परिवार की सारी जिम्मेदारी उनकी मां के कंधे पर आ गई और उनकी मां ने कभी हार नहीं मानी और पूरी शिद्दत के साथ अपने कर्तव्य का पालन करें हालातों को देखते हुए उन्होंने अपने शुरुआती पढ़ाई गांव के एक छोटे से स्कूल में पूरी करी थी इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर में चले गए जहां पर उन्होंने अपनी गरीबी से लड़ते हुए किसी तरीके से अपने सरकारी कॉलेज में पढ़ाई को अंजाम दिया जहां उनकी गरीबी के बावजूद भी वह हार नहीं माने पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती हाथी की किस तरीके से वहां समाज में चल रही बेरोजगारी से बचेंगे। उन्होंने कई जगह जाकर रोजगार मांगने की कोशिश करी लेकिन यहां पर भी उनके हाथ निराशा लगी है और वहां इस काम में सफल रहे।

₹40 महीने पर किया करते थे एक होटल में खाना

मोहन सिंह ओबरॉय की मेहनत रंग लाई और उन्हें ₹40 महीना की तनख्वाह पर एक होटल में बतौर कलर काम मिल गया है उसके बाद उनका खुशी का ठिकाना नहीं था लेकिन फिर भी उन्होंने मेहनत करनी नहीं छोड़ी कुछ महीने बाद उनके काम को देखते हुए उनकी तनख्वाह ₹50 महीना करने का फैसला किया गया उसे योग द्वारा उस समय बीतने पर मोहन सिंह ओबरॉय होटल प्रबंधन को होटल की तरफ से आवास मुहैया कराने की बात कही तो उनकी बात को तो बंधन की तरफ से हामी भर ली गई और उसके बाद वह अपने परिवार सहित होटल के दिए हुए आवास में रहने लगे और उनके जीवन की कुछ हद तक की परेशानियां कम हो गई कुछ महीने बाद होटल के मेरिट में बदलाव हुआ और उनकी स्टेनोग्राफी के साथ कैसे दिया गया और उनके जीवन की परेशानियों और कम हो गई पहले से ही जानते थे की उनके लिए यह काम आसान नहीं होगा लेकिन फिर भी उन्होंने प्रयास करना नहीं छोड़ा।

जीवन में कठिन परिश्रम के बाद आगे चलकर बनाया और ओबेरॉय ग्रुप

मोहन सिंह ओबेरॉय को होटल का मालिकाना हक मिलने के बाद भी अपने जीवन में मेहनत करनी नहीं छोड़ी और लगातार प्रयास करते रहे उन्होंने वर्ष 1934 में ओबेरॉय ग्रुप की स्थापना की जिसमें 29 होटल और पांच बहू सुविधाएं संपन्न त्र होटल भी शामिल थे उस वक्त उनका काफी नाम हुआ करता था यदि हम आज के बाद करें तो ग्रुप दुनिया के 6 देशों में अपनी एक अलग पहचान बना चुका है और हर जगह अलग पहचान से जाना जाता है यह कहानी बताती है कि कभी काम के लिए मोहताज मोहन सिंह ने इस पूरे सफर को अपनी मेहनत के दम पर पूरा किया और आज के पास 7000 करोड़ का ग्रुप है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता उनकी कहानी इस बात का प्रमाण देती है कि खासतौर पर जो भी व्यक्ति प्रयास करता है उसे कभी भी सफलता नहीं मिलती दुनिया भविष्य को लेकर आशंकित है ऐसे में हमें सीख मिलती है कि भले ही चुनौतियां बड़ी हो लेकिन अगर हम डट कर उसका सामना करते हैं तो हम किसी भी परेशानी से जीत कर अपनी मंजिल को पा सकते हैं।

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