अगर आप जीवन में पाना चाहते हैं लक्ष्मी जी की अपरंपार कृपा दो जरूर करें इस प्रार्थना स्रोत का पाठ

ज्ञान धार्मिक

यह बात तो आप सभी जरूर जानते होंगे कि इस वक्त मां लक्ष्मी के व्रत चल रहे हैं और हरि भक्त इसी कोशिश में जुटा हुआ है कि वह किसी तरीके से मां लक्ष्मी को प्रस्थान कर ले क्योंकि महालक्ष्मी धन तथा वैभव की प्रतीक माने जाते हैं। और जिस भी भक्त पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है उसे जीवन भर के सभी कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता और उसके जीवन में धन की वर्षा होती रहती है। कहा जाता है महालक्ष्मी के वरदान से सब कुछ अच्छा होता जाता है और उनके आश्चर्यजनक रूप से असीम संपदा मिलना शुरू हो जाती है. वैसे हर दिन महालक्ष्मी की पूजा करने से धन प्राप्त किया जा सकता है. फिलहाल हम आपको बताने जा रहे हैं महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र के बारे में. इसकी रचना इन्द्र के द्वारा की गई थी. वैसे इसके पीछे एक कथा है जो आज हम आपको बताने जा रहे हैं. आइए जानते हैं.

कथा- एक बार देवराज इन्द्र ऐरावत हाथी पर चढ़कर जा रहे थे. रास्ते में दुर्वासा मुनि मिले. मुनि ने अपने गले में पड़ी माला निकालकर इन्द्र के ऊपर फेंक दी. जिसे इन्द्र ने ऐरावत हाथी को पहना दिया. तीव्र गंध से प्रभावित होकर ऐरावत हाथी ने सूंड से माला उतारकर पृथ्वी पर फेंक दी. यह देखकर दुर्वासा मुनि ने इन्द्र को शाप देते हुए कहा, ‘इन्द्र! ऐश्वर्य के घमंड में तुमने मेरी दी हुई माला का आदर नहीं किया. यह माला नहीं, लक्ष्मी का धाम थी. इसलिए तुम्हारे अधिकार में स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी.’ महर्षि दुर्वासा के शाप से त्रिलोकी श्रीहीन हो गई और इन्द्र की राज्यलक्ष्मी समुद्र में प्रविष्ट हो गई. देवताओं की प्रार्थना से जब वे प्रकट हुईं, तब उनका सभी देवता, ऋषि-मुनियों ने अभिषेक किया. देवी महालक्ष्मी की कृपा से सम्पूर्ण विश्व समृद्धशाली और सुख-शांति से संपन्न हो गया. आकर्षित होकर देवराज इन्द्र ने उनकी इस प्रकार स्तुति की :

महालक्ष्मी कृपा प्रार्थना स्तोत्र

इन्द्र उवाच

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते.
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..1..

अर्थ- इन्द्र बोले, श्रीपीठ पर स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये. तुम्हें नमस्कार है. हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है.

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि.
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..2..

अर्थ- गरुड़ पर आरुढ़ हो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मी! तुम्हें प्रणाम है.

सर्वज्ञे सर्ववरदे देवी सर्वदुष्टभयंकरि.
सर्वदु:खहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..3..

अर्थ- सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दु:खों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है.

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि.
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..4..

अर्थ- सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवती महालक्ष्मी! तुम्हें सदा प्रणाम है.

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि.
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..5..

अर्थ- हे देवी! हे आदि-अन्तरहित आदिशक्ति! हे महेश्वरी! हे योग से प्रकट हुई भगवती महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है.

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे.
महापापहरे देवि महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..6..

अर्थ- हे देवी! तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली हो. हे देवी महालक्ष्मी! तुम्हें नमस्कार है.

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणी.
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..7..

अर्थ- हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवी! हे परमेश्वरी! हे जगदम्ब! हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है.

श्वेताम्बरधरे देवि नानालंकारभूषिते.
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मी नमोऽस्तु ते..8..

हे देवी तुम श्वेत एवं लाल वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषिता हो. संपूर्ण जगत् में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो. हे महालक्ष्मी! तुम्हें मेरा प्रणाम है.

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