“करमा पर्व “होता है भाई बहन के सच्चे रिश्ते का प्रतीक जानिए , किस पौराणिक कथा से है जुड़ा हुआ

ज्ञान धार्मिक

हर वर्ष 29 अगस्त को देशभर में करमा पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। धीरे धीरे इस पर्व के बारे में लोगों के बीच उत्सुकता बढ़ती जा रही है। प्रतिवर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी तिथि को इस पावन पर्व को बड़ी ही धूमधाम से सभी लोग मनाते हैं। आमतौर पर इस पर्व के दिन भाई बहन के सच्चे भंधन को सच्चे रूप में विस्थापित करने के लिए मनाया जाता है।

करमा और धरमा की पौराणिक कथा…. 

कथा के अनुसार, करमा और धरमा नामक दो भाई थे. बताया जाता है कि दोनों भाईयों ने अपनी बहन की रक्षा के लिए अपनी जिंदगी को भी दांव पर लगा दिया था. दोनों भाई बहुत गरीब थे. उनकी बहन बचपन से ही भगवान से उनकी सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करती थी.  बहन द्वारा किए गए तप की वजह से ही दोनों भाईयों के घर में सुख-समृद्धि आई थी. इस एहसान का बदला चुकाने के लिए दोनों भाईयों ने दुश्मनों से अपनी बहन की रक्षा करते हुए अपनी जान तक गंवा दी थी. इस पर्व को मनाने की परंपरा यहीं से शुरु हुई थी.

इस त्योहार से संबंधित दोनों भाईयों की एक और कहानी है. 

एक बार करमा परदेस गया और वहीं जाकर व्यापार करने में मशगूल हो गया. बहुत दिनों बाद जब वह घर वापस आया तो उसने देखा कि उसका छोटा भाई धरमा करमडाली की पूजा में लीन है. धरमा ने अपने बड़े भाई के लौट आने पर कोई खुशी नहीं जताई. यहां तक कि वह पूजा में ही लीन रहा. इससे करमा को गुस्सा आ गया और करमडाली, धूप, नैवेद्य आदि को फेंक दिया और भाई के साथ झगड़ा करने लगा. लेकिन धरमा सबकुछ चुपचाप सहता रहा. समय बीतता गया और करमा को देवता का कोपभाजन बनना पड़ा, उसकी सारी सुख-समृद्धि चली गई.

आखिरकार धरमा को दया आ गई और उसने अपनी बहन के साथ देवता से अपने भाई को माफ़ करने के लिए प्रार्थना की।  दोनों की प्रार्थना ईश्वर ने सुन ली और एक रात कर्मा को देवता ने सपना देकर करमडाली की पूजा करने के लिए कहा. करमा ने बिलकुल वैसा ही किया और उसकी सारी सुख-समृद्धि वापस आ गई.

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