जब गणेश जी के रूप पर आई थी चंद्रा देवी को हंसी फिर उनको मिला ये श्राप

ज्ञान धार्मिक

गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत देश में हर जगह बड़ी ही धूमधाम से और हर्षोल्लास के साथ हर वर्ष मनाया जाता है। इस वर्ष भी यह पावन पर्व 1 अगस्त को आने वाला है जिसके लिए सभी भक्तजन हृदय से बहुत ज्यादा उत्साहित नजर आ रहे हैं लेकिन आज हम आपको भगवान श्री गणेश से जुड़ी एक ऐसी कथा के बारे में सुनाने वाले हैं इसे सुनकर आप भी अचंभित रह जाएंगे और आपको भी यकीन नहीं हुआ होगा कि पुराने काल में ऐसा भी हो चुका है क्योंकि यह कहां नहीं कुछ विचित्र सी है। ऐसे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं गणेश जी और चंद्र देव की कथा. आइए बताते हैं.

गणेशजी ने चंद्र को दिया था शाप : शिवपुराण में बताया गया है कि प्राचीन समय में भादौ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेशजी का जन्म हुआ था. इस वजह से चतुर्थी तिथि पर गणेशजी के लिए विशेष पूजा – पाठ किया जाता है. एक अन्य मान्यता के अनुसार गणेशजी ने शिवजी को पार्वती से मिलने से रोका था. वे अपनी माता पार्वती की आज्ञा का पालन कर रहे थे. पार्वती ने कहा था कि किसी को भी मेरे कक्ष में आने मत देना. जब शिवजी को गणेशजी ने रोका तो शिवजी क्रोधित हो गए और अपने त्रिशूल से गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया. जब पार्वती को ये बात मालूम हुई तो उन्होंने शिवजी से गणेशजी को पुन: जीवित करने के लिए कहा. तब शिवजी ने गणेशजी के धड़ पर हाथी का सिर लगा दिया और उन्हें जीवित कर दिया.

इसके बाद एक दिन चंद्र गणेशजी का ये स्वरूप देखकर हंस रहे थे. गणेशजी ने चंद्र को देख लिया. चंद्रदेव को अपने सुंदर स्वरूप का घमंड था. तब गणेशजी ने चंद्र को शाप दिया कि अब तुम धीरे – धीरे क्षीण होने लगोगे. ये शाप सुनकर चंद्र ने गणेशजी से क्षमा मांगी. तब गणपति ने कहा कि ये शाप निष्फल तो नहीं जा सकता , लेकिन इसका प्रभाव कम हो सकता है. तुम चतुर्थी का व्रत करो. इसके पुण्य से तुम फिर से बढ़ने लगोगे. चंद्रदेव ने ये व्रत किया. इसी घटना के बाद से चंद्र कृष्ण पक्ष में घटता है और फिर शुक्ल पक्ष में बढ़ने लगता है.

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