Home / News / एक ऐसे IAS ओफ्फिसर जो पैरों से विकलांग होने के बाद भी पैरालंपिक में किया भारत का नाम रोशन “भारत को दिलाया रजत पदक “

एक ऐसे IAS ओफ्फिसर जो पैरों से विकलांग होने के बाद भी पैरालंपिक में किया भारत का नाम रोशन “भारत को दिलाया रजत पदक “

पुरानी कहावत है अगर आपने सच्चे दिल से मेहनत करी तो एक न एक दिन आपको उस मेहनत का परिणाम है उसे मिलेगा आज हम आपको एक ऐसे ही आईएएस अधिकारी के बारे में बताने वाले हैं जिन की कहानी सुनकर आपको भी यकीन नहीं हुआ उन्होंने पहले तो यूपीएससी जैसी कठिन परीक्षा को पास कर इतिहास रच दिया और अपने परिवार का मान सम्मान और ऊंचा कर दिया उन्होंने पैरालंपिक जैसे खेलों में रजत पदक जीतकर पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया और अपना एक अलग मुकाम बना लिया इस देश में भारत देश में मशहूर आईएएस अधिकारी का नाम है नाम सुहास एलवाई।

वहां अपने जीवन में पैरों से दिव्यांग और बचपन से ही पिता का साथ होने के बाद भी उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी और अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाते हुए जीवन भर मेहनत करते रहे उसी का नतीजा था कि उन्होंने अपनी पढ़ाई की बदौलत यूपीएससी की परीक्षा को पास किया और अपने सपने को साकार किया उतनी ही शिद्दत के साथ उन्हें खेल में भी रुचि थी जिस को पूरा करने के लिए वहां नौकरी के साथ साथ लगातार परीक्षण किया करते थे और उनकी इस प्रतिभा का नजारा तो पूरी दुनिया ने 2021 के ओलंपिक खेलों में और उनका मनोबल बढ़ाया।

सुहास एलवाई के जीवन की कहानी

सुहास एलवाई का पूरा नाम सुहास लालिनाकेरे यतिराज है। इनका जन्म कर्नाटक के एक छोटे से जिले की मुंह में हुआ था वह मध्यमवर्गीय परिवार से अपने तालुकात रखते हैं और बचपन से ही उन्हें खेलकूद में रुचि थी और वह खेलना कूदना काफी पसंद करते थे बचपन से ही उन्हें क्रिकेट खेलने का काफी ज्यादा शौक था लेकिन पैरों से दिव्यांग होने की वजह से उन्हें इस खेल को खेलने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था लेकिन उसके बावजूद भी वह उस खेल को खेलते थे हालांकि उनके पिता की तरफ से पूरा सहयोग मिला जिसकी वजह से अपने जीवन में इस मुकाम पर पहुंच गए हैं।

यूपीएससी की परीक्षा में 382 वि रैंक लाकर करी थी सफलता प्राप्त

पढ़ाई में वह बचपन से ही बहुत ही ज्यादा रुचि रखते थे और दूसरे बच्चों से काफी तेज भी थे उन्होंने साल 2006 में 388 रैंक हासिल करी थी और अपने सपने को पूरा किया था सुभाष बताते हैं कि यूपीएससी की परीक्षा में सफलता के दौरान उन्होंने अपने माता-पिता की कमी बहुत महसूस हुई थी हालांकि परिवार में उनकी सफलता को लेकर काफी खुशी का माहौल था जिसकी वजह से वह जीवन भर काफी खुश हैं उनकी कुछ सालों में आजमगढ़ में नियुक्ति हो गई जहां पर उन्होंने जिलाधिकारी बंद अपने क्षेत्र का काफी विकास किया सुभाष का सफर नौकरी लगने के बाद भी खत्म नहीं हुआ और उन्होंने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी और लगातार प्रयास करते रहे।

जा चुका है नाम सर्वोच्च नागरिक सम्मान के लिए

सुभाष को बचपन से ही परीक्षा के साथ-साथ खेलकूद में भी काफी रूचि थी जिसकी झलक उन्होंने हमें अब दिखा दिए जिला धार बनने के बाद उन्होंने सन 2016 में बीजिंग चीन में हुई एशियाई पैरा बैडमिंटन में चैंपियनशिप जीतने वाले पहले भारतीय बन कर इतिहास रचा और भारत देश का नाम रोशन करें इसके बाद उन्होंने सन 2018 में वाराणसी में हुए बैडमिंटन प्रतियोगिता में राष्ट्रीय स्तर पर चैंपियन बनाया लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया और उनका अपने जिले में काफी नाम और सम्मान है।