क्या आपने पुरानी कथाओं में सुनी है पितृ प्रेम की कहानियां

ज्ञान धार्मिक

जैसा कि आपको पता है कि आज फादर्स डे है और पिता का प्यार अविश्वसनीय और बिना किसी लालच के होता है पिता और पुत्र के संबंधों के बारे में हमारे पौराणिक कथाओं में भी कहा गया है आज हम आपको बताने जा रहे हैं पिता और पुत्र के पौराणिक संबंधों की कथा

1. महाभारत में पितृ भक्ति : हस्तिनापुर नरेश शांतनु का पराक्रमी एवं विद्वान पुत्र देवव्रत उनका स्वाभाविक उत्तराधिकारी था, लेकिन एक दिन शांतनु की भेंट निषाद कन्या सत्यवती से हुई और वे उस पर मोहित हो गए. उन्होंने सत्यवती के पिता से मिलकर उसका हाथ मांगा. पिता ने शर्त रखी कि मेरी पुत्री से होने वाले पुत्र को राजसिंहासन का उत्तराधिकारी बनाएं, तो ही मैं इस विवाह की अनुमति दे सकता हूं. शांतनु देवव्रत के साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकते थे. वे भारी हृदय से लौट आए लेकिन सत्यवती के वियोग में व्याकुल रहने लगे. उनका स्वास्थ्य गिरने लगा. जब देवव्रत को पिता के दुख का कारण पता चला, तो वह सत्यवती के पिता से मिलने जा पहुंचा और उन्हें आश्वस्त किया कि शांतनु के बाद सत्यवती का पुत्र ही सम्राट बनेगा.
उसके बाद निषाद ने कहा कि आप तो अपना दावा त्याग रहे हैं लेकिन भविष्य में आपकी संतानें सत्यवती की संतान के लिए परेशानी खड़ी नहीं करेंगी, इसका क्या भरोसा! तब देवव्रत ने उन्हें आश्वस्त किया कि ऐसी स्थिति उत्पन्न ही नहीं होगी और उसने वहीं प्रतिज्ञा की कि वह आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेगा. इस पर निषाद सत्यवती का हाथ शांतनु को देने के लिए राजी हो गए. जब शांतनु को अपने पुत्र की प्रतिज्ञा का पता चला, तो उन्होंने उसे इच्छा मृत्यु का वरदान दिया और कहा कि अपनी प्रतिज्ञा के कारण अब तुम भीष्म के नाम से जाने जाओगे.

2 राम-दशरथ की पितृ-भक्ति : अयोध्या के सुयोग्य उत्तराधिकारी थे भगवान श्रीराम. आपको पता ही होगा सम्राट के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते यह उनका अधिकार भी बनता था मगर पिता की आज्ञा उनके लिए सारे राजसी सुखों से कहीं बढ़कर थी. अतः उनकी आज्ञा जानते ही राम बिना किसी प्रश्न के, बिना किसी ग्लानि या त्याग जताने के अहंकार के, वन की ओर जाने को तत्पर हो उठे. स्वयं दशरथ के मन में श्रीराम के प्रति असीम स्नेह था, मगर वे वचन से बंधे थे. एक ओर पुत्र प्रेम था, तो दूसरी ओर कैकयी को दिया वचन पूरा करने का कर्तव्य. वहीं इस द्वंद्व में जीत कर्तव्य की हुई और दशरथ ने भरे मन से राम को वनवास का आदेश सुना दिया. उसके बाद राम ने तो पिता की आज्ञा का पालन करते हुए निःसंकोच वन का रुख कर लिया किंतु दशरथ का पितृ हृदय पुत्र का वियोग और उसके साथ हुए अन्याय को सह न सका और अंततः राम का नाम लेते हुए ही वे संसार को त्याग गए.

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