आईएएस ऑफिसर बना होटल में काम करने वाला एक वेटर ,सभी लोगों ने दी बधाइयां: नौजवानों के लिए बना प्रेरणा का स्रोत

समाज

कुछ वर्ष पहले तक के. जयगणेश करते थे वेटर का काम एक होटल में। आज वहां बन चुके हैं भारत के एक आईएएस अधिकारी। आईएएस अधिकारी बनने के लिए उन्हें बहुत से कार्य करने पड़े जैसे कि उन्होंने होटल में काम किया और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए उन्हें कई अन्य काम करने पड़े। जैसे कि कभी-कभी वहां सिनेमाघरों में टिकट भी बेचा करते थे अपने पराए का शुल्क उठाने के लिए। आजकल के नौजवान बहुत ही जल्द किसी भी कार्य में हार मान जाते हैं ऐसे नौजवानों के लिए है ये एक प्रेणा शारोथ हे।

उन्हें आईएएस बनने में काफ़ी संघर्षों का सामना करना पड़ा। गणेश जिस होटल में काम कर रहे थे जब उस होटल के मालिक को पता चला कि उनका वेटर अब एक आईएएस अधिकारी बन गया है तो वह ख़ुद को रोक ना सके और गणेश के घर मिठाई लेकर पहुँच गए उन्हें बधाइयाँ देने।

अक्सर लोग दो या तीन बार असफल होने के बाद हार मान कर बैठ जाते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और दो तीन बार असफल होने के बाद ख़ुद को और मज़बूत बनाया और आखिरकार 2016 सातवीं बार में इन्होंने यूपीएससी परीक्षा को क्रैक किया और 156वीं रैंक हासिल की।

के. जयगणेश, जो कुछ वर्षों पहले तक, होटल में वेटर का काम किया करते थे, आज वह एक भारत के आईएएस अधिकारी बन चुके हैं। IAS बनने के लिए उन्होंने ना सिर्फ़ होटल में ही काम किया है बल्कि उन्होंने अपनी पढ़ाई और ख़र्च के लिए सिनेमाघरों में टिकट बेचने तक का काम किया है।  

उन्हें आईएएस बनने में काफ़ी संघर्षों का सामना करना पड़ा। गणेश जिस होटल में काम कर रहे थे जब उस होटल के मालिक को पता चला कि उनका वेटर अब एक आईएएस अधिकारी बन गया है तो वह ख़ुद को रोक ना सके और गणेश के घर मिठाई लेकर पहुँच गए उन्हें बधाइयाँ देने।

अक्सर लोग दो या तीन बार असफल होने के बाद हार मान कर बैठ जाते हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और दो तीन बार असफल होने के बाद ख़ुद को और मज़बूत बनाया और आखिरकार 2016 सातवीं बार में इन्होंने यूपीएससी परीक्षा को क्रैक किया और 156वीं रैंक हासिल की।

तमिलनाडु के रहने वाले हैं के. जय गणेश। अपने परिवार में चार भाई बहनों में सबसे बड़े गणेश के परिवार के खर्चे की भी जिम्मेदारी थी। घर ख़र्च चलाने का जिम्मा जल्द ही इनके ऊपर आ गया, क्योंकि उनके पिता एक लेदर फेक्ट्री में सुपरवाईजर के तौर पर काम करते थे जहाँ मासिक आय सिर्फ़ 4500 रुपये थी। जिससे इतने बड़े परिवार का घर ख़र्च चलाना असंभव था। यही वज़ह थी कि उन्होंने पढ़ाई करने के दौरान काम भी किया।

इसके बाद भी वह लगातार पढ़ाई करते रहें, कोई समझौता नहीं किया। वह पढ़ने में शुरू से ही अव्वल थे। 10वीं में टॉप करने के साथ-साथ उन्होंने अपनी 12वीं की परीक्षा भी 91वे प्रतिशत अंकों के साथ पास की। इतने अंकोंं से उस समय उनके आस पास के किसी भी गाँव में कोई पास नहीं हो पाया था। 12वीं करने के बाद उन्होंने इंजीनीयरिंग में जाने का फ़ैसला लिया और मैकेनिकल इंजीनीयर में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्हें एक 25 हज़ार रुपये की नौकरी भी मिल गई और वह कुछ सालों तक नौकरी करने लगे क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति उतनी बेहतर नहीं थी।

कुछ सालों तक नौकरी करने के बाद उनका मन में सरकारी नौकरी की चाह होने लगी। इसलिए उन्होंने ग्रुप-सी और डी तक की नौकरी के लिए आवेदन करना शुरू किया और इसी दौरान उन्होंने यूपीएससी परीक्षा कि तैयारी नौकरी करते हुए ही शुरू कर दी। लेकिन अपनी तैयारी से वह दो साल तक प्री एग्जाम भी क्लियर नहीं कर पाए।

तब उन्हें लगा कि अगर इस परीक्षा को क्लियर करना है तो अपना 100 प्रतिशत देना होगा और उन्होंने नौकरी छोड़ तैयारी करना शुरू किया।वह इस परीक्षा कि बेहतर तैयारी के लिए कोचिंग करने चेन्नई चले गए। तैयारी के दौरान कमाए हुए सब पैसे भी ख़र्च हो गए। इसलिए उन्होेंने चेन्नई में रहते हुए ही एक होटल में वेटर का काम करना शुरू किया। दिन के 6 घंटे वह काम करने के साथ-साथ बाक़ी वक़्त वह अपनी कोचिंग और पढ़ाई में लगाते।

इसी तरह उन्होंने एक दूसरा पार्ट टाईम जॉब भी किया, जिसमें वह सिनेमा हॉल में टिकट काटने का काम करते थे। अपनी पढ़ाई के लिए उन्होंने किसी तरह के कोई भी काम करने के लिए झिझक महसूस नहीं की। लेकिन हर बार वह सफलता से दो क़दम पीछे ही रह जाते। कभी प्री तो कभी मेंस तो कभी इंटरव्यू में पास नहीं हो पाते। वह अपने छठे प्रयास में भी इंटरव्यू तक आए लेकिन उसे क्लियर नहीं कर पाए।

इस दौरान वह सरकारी नौकरी के लिए भी आवेदन करते थे जब वह छठे प्रयास में भी असफल रहे तब वह एक दम टूट से गए। लेकिन यहाँ तक आने के बाद उन्होंने सोचा कि वह परीक्षा के बारे में काफ़ी कुछ जान गए हैं और उन्हें एक आखिरी प्रयास करना चाहिए।

इसलिए उन्होंने 7वी बार परीक्षा दी और 156वी रैंक लाकर सबको हैरत में डाल दिया। उनकी सफलता कि ये कहानी उनकी दृढ इच्छा शक्ति और संकल्प को दिखाती है। आज वह कई ऐसे आईएएस एसपीरेंट्स के लिए प्रेरणा हैं, असफल होकर सफलता से कोसों दूर चले जाते हैं।

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